दिव्यांगता प्रमाणपत्र दरकिनार नहीं कर सकता मेडिकल बोर्ड, हाईकोर्ट ने कहा—प्रतिशत तय करने का अधिकार बोर्ड को नहीं
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिव्यांगता प्रमाणपत्र से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी मेडिकल बोर्ड को सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र को मनमाने तरीके से दरकिनार कर दिव्यांगता प्रतिशत घटाने या बढ़ाने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि निर्धारित प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी के प्रमाणपत्र को उचित आधार के बिना नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
NEET-UG में दिव्यांग कोटे से प्रवेश का मामला
मामला गौतमबुद्ध नगर निवासी सोया पाल से जुड़ा है। उन्होंने NEET-UG की प्रवेश परीक्षा में दिव्यांग कोटे से भाग लिया था। उन्हें दिव्यांग श्रेणी में निर्धारित कटऑफ से अधिक अंक प्राप्त हुए थे।
मेडिकल बोर्ड की जांच के दौरान उनकी दिव्यांगता 22 प्रतिशत बताई गई। इसके खिलाफ अपील किए जाने पर अपीलीय बोर्ड ने दिव्यांगता प्रतिशत 28 प्रतिशत बताया और चयन प्रक्रिया के लिए उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया।
मेडिकल बोर्ड ने 47 फीसदी दिव्यांगता प्रमाणपत्र को माना दरकिनार
याचिका में बताया गया कि अधिकृत प्राधिकारी की ओर से छह मार्च को 47 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता का प्रमाणपत्र जारी किया गया था। हालांकि मेडिकल बोर्ड ने इस प्रमाणपत्र को दरकिनार कर दिया और याची को दिव्यांग श्रेणी का लाभ देने से इनकार कर दिया।
याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को चुनौती दी।
कोर्ट ने मेडिकल और अपीलीय बोर्ड की राय में पाया अंतर
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि मेडिकल बोर्ड और अपीलीय बोर्ड की रिपोर्ट में भी अंतर था। एक बोर्ड ने दिव्यांगता 22 प्रतिशत, जबकि दूसरे ने 28 प्रतिशत बताई थी।
याची की ओर से तर्क दिया गया कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाणपत्र के आधार पर उसे दिव्यांग कोटे का लाभ मिलना चाहिए।
दिव्यांगता प्रतिशत तय करने का अधिकार किसका?
मामले में हाईकोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि किसी उम्मीदवार के लिए दिव्यांगता प्रतिशत निर्धारित करने का अधिकार संबंधित सक्षम प्राधिकारी और निर्धारित प्रक्रिया के तहत गठित बोर्ड से जुड़ा है। केवल अपनी रिपोर्ट के आधार पर किसी अन्य बोर्ड द्वारा पहले से जारी प्रमाणपत्र को नजरअंदाज करना उचित नहीं हो सकता।
कोर्ट ने यह भी माना कि सीबीएमएसई पाठ्यक्रम के तहत मेडिकल पढ़ाई के दौरान जरूरी ज्ञान और काम करने की क्षमता से जुड़े पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने याचिका पर राहत दी
समाचार रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने मामले में याची को राहत देते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट की टिप्पणी का मूल मुद्दा यह रहा कि बिना उचित आधार के अधिकृत दिव्यांगता प्रमाणपत्र को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
बिजली कनेक्शन के मामले में भी हाईकोर्ट की टिप्पणी
इसी समाचार में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अन्य मामले का उल्लेख भी किया गया है। इसमें कोर्ट ने कहा कि बिना कारण बताए बिजली कनेक्शन का आवेदन खारिज करना उचित नहीं है।
न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सर्वेश कुमार सिंह की खंडपीठ ने गौतमबुद्ध नगर निवासी देवी सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए बिना कारण बिजली कनेक्शन देने से इनकार करने वाले आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को दो सप्ताह में बिजली कनेक्शन देने की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया।
निष्कर्ष: हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि दिव्यांगता प्रमाणपत्र और उसके आधार पर मिलने वाले अधिकारों को केवल अलग रिपोर्ट के आधार पर मनमाने ढंग से दरकिनार नहीं किया जा सकता। मामले में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण है।

