हाईकोर्ट ने पिछड़ा वर्ग आयोग के आदेश को भी किया रद्द
लखनऊ, जूनियर इंजीनियर (जेई) भर्ती में नियुक्त सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के विरुद्ध पारित बर्खास्तगी आदेश के खिलाफ दाखिल याचिकाओं की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने यह भी कहा कि आरक्षण व्यवस्था को लागू करना अनिवार्य है, लेकिन आरक्षण सुधारने के नाम पर ऐसी प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती जो कानून और मूल चयन प्रक्रिया के विपरीत हो। इसके साथ ही न्यायालय ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के 28 जनवरी 2014 के आदेश को भी अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए निरस्त कर दिया।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि जो आदेश विधिक दृष्टि से बुनियादी रूप से ही गलत हो, उसके आधार पर की गई, प्रशासनिक कार्रवाई को भी वैध नहीं ठहराया जा सकता। न्यायमूर्ति इरशाद अली की एकल पीठ ने जूनियर इंजीनियर राकेश प्रताप सिंह व अन्य की ओर से दाखिल अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करके यह फैसला सुनाया है।
जल निगम ने वर्ष 2013 में जूनियर इंजीनियरों के 470 पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। इसके संबंध में आरक्षित वर्ग के कुछ अभ्यर्थियों को लेकर चयन प्रक्रिया पर सवाल उठे और इसे सुधारने की कवायद शुरू हुई। 7 जनवरी 2014 को जल निगम के प्रबंध निदेशक ने भर्ती में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की। याचियों की ओर से कहा गया कि उक्त समिति ने 15 जनवरी 2014 को अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर सिफारिश की कि छूटे हुए अतिरिक्त आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को दूसरे चरण की उपलब्ध 469 रिक्तियों में समायोजित किया जाए और किसी भी सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी की सेवा समाप्त न की जाए। बावजूद इसके आरक्षित अभ्यर्थियों के समायोजन की सिफारिश तो स्वीकार कर ली गई, जबकि सामान्य वर्ग के कर्मचारियों को सेवा में बनाए रखने की सिफारिश की अनदेखी कर दी गई। तत्पश्चात राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने 28 जनवरी 2014 को जल निगम को आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की नई चयन सूची तैयार करने का निर्देश दिया। बाद में 136 अतिरिक्त ओबीसी/एससी अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई, इससे 470 मूल पदों के मुकाबले कुल 543 नियुक्तियां हो गईं और उपलब्ध रिक्तियों में उनका समायोजन कर लिया गया। 2 दिसंबर 2014 को याची राकेश प्रताप सिंह समेत 73 सामान्य वर्ग के कनिष्ठ अभियंताओं की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर 2014 को बर्खास्तगी आदेशों को निरस्त करते हुए, जल निगम को मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया। अब अपने फैसले में न्यायालय ने कहा कि नियमित चयन और नियुक्ति के बाद कर्मचारियों की नियुक्तियों को केवल चयन प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितता के आधार पर शून्य नहीं माना जा सकता।

