इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुज़ारा-भत्ता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि पत्नी को आर्थिक तंगी और बेबसी की स्थिति में जीवन बिताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि पत्नी को सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है और उसे गुज़ारा-भत्ता से वंचित करना इस संवैधानिक अधिकार के विपरीत हो सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण की राशि पति की ओर से कोई दान या उपकार नहीं, बल्कि पत्नी का कानूनी अधिकार है।
न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने यह टिप्पणी पति देवांश की उस क्रिमिनल रिविज़न याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें उसने गौतम बुद्ध नगर के परिवार न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने पति को पत्नी को हर महीने 20 हजार रुपये गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने आदेश को बरकरार रखा। मामले के अनुसार, दोनों की शादी जुलाई 2017 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। पत्नी ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद उससे दहेज की मांग की गई और उसे प्रताड़ित किया गया। दहेज में स्विफ्ट कार और 100 वर्ग गज का प्लॉट मांगे जाने का भी आरोप लगाया गया।
पत्नी के मुताबिक 30 मार्च 2018 को पति और उसके परिवार के सदस्यों ने उसके साथ मारपीट की और उसे घर में बंद कर दिया। घटना के बाद उसने पुलिस को सूचना दी और 2 अप्रैल 2018 से अपने मायके में रहने लगी।
पत्नी ने अदालत को बताया था कि उसकी अपनी कोई स्वतंत्र आय नहीं है और वह आर्थिक रूप से कमजोर तथा वृद्ध पिता पर निर्भर है। उसने यह भी दावा किया कि उसका पति सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और करीब 70 हजार रुपये प्रतिमाह कमाता है। इसके अलावा पति और उसके परिवार के पास कई संपत्तियां और व्यवसाय हैं, जिनसे करीब दो लाख रुपये प्रतिमाह की आय होती है। पत्नी ने अपने भरण-पोषण के लिए 30 हजार रुपये प्रतिमाह की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद पाया था कि पत्नी के पास पति से अलग रहने का पर्याप्त कारण था। वह अपना खर्च खुद उठाने की स्थिति में नहीं थी, जबकि पति के पास उसके भरण-पोषण के लिए पर्याप्त साधन थे। हाईकोर्ट ने इन निष्कर्षों को सही ठहराया।
पीठ ने कहा कि पत्नी और नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करना पति का केवल कानूनी दायित्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है। गुज़ारा-भत्ता देने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी और बच्चे गरीबी, उपेक्षा और बेबसी की स्थिति में न पहुंचें।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 15(3), 21 और 39 का उल्लेख करते हुए कहा कि भरण-पोषण संबंधी कानूनी प्रावधान सामाजिक न्याय की संवैधानिक भावना को लागू करते हैं। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। ऐसे में पत्नी को आर्थिक बदहाली में धकेलना इस अधिकार की भावना के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भुवन मोहन सिंह बनाम मीना और चतुर्भुज बनाम सीताबाई मामलों का भी हवाला दिया। इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने गुज़ारा-भत्ता को सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए कहा था कि इसका उद्देश्य पत्नी को गरीबी और बेघर होने की स्थिति से बचाना है।
अदालत ने कहा कि गुज़ारा-भत्ता कोई तोहफा नहीं बल्कि वैवाहिक संबंध से उत्पन्न अधिकार है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की क्रिमिनल रिविज़न याचिका खारिज करते हुए पत्नी को 20 हजार रुपये प्रतिमाह गुज़ारा-भत्ता देने का फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।

