सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती नीति पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
लखनऊ। सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त स्वीकृत पदों को मानदेय पर भरने की राज्य सरकार की नीति को हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने रद्द कर दिया है। करीब 190 याचिकाओं पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने सरकार को नई व्यवस्था बनाने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि स्वीकृत पद पर अस्थायी रूप से नियुक्त शिक्षक को संबंधित पद का न्यूनतम वेतनमान और अनुमन्य भत्ते दिए जाने चाहिए।
2023 और 2024 के शासनादेश निरस्त
कोर्ट ने राज्य सरकार के 9 नवंबर 2023 और 8 जुलाई 2024 के शासनादेशों को निरस्त कर दिया। पहले आदेश के तहत लंबे समय से कार्यरत तदर्थ शिक्षकों की सेवाएं समाप्त की गई थीं। इसके बाद शिक्षकों की कमी का हवाला देते हुए जुलाई 2024 में स्वीकृत पदों पर शिक्षकों को मानदेय पर नियुक्त करने की व्यवस्था लागू की गई थी।
हाईकोर्ट ने दोनों शासनादेशों के बीच विरोधाभास पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले तदर्थ शिक्षकों को हटाना और बाद में शिक्षकों की कमी बताकर मानदेय पर नियुक्ति की व्यवस्था करना ‘एंप्लॉयमेंट एंड प्रोजेक्ट’ के सिद्धांत के विपरीत है।
स्वीकृत पद पर मानदेय नहीं, वेतनमान का लाभ
सरकार की नीति के तहत हाईस्कूल स्तर पर शिक्षकों को 25 हजार रुपये और इंटरमीडिएट स्तर पर 30 हजार रुपये मासिक मानदेय दिया जाना था।
कोर्ट ने कहा कि इन स्वीकृत पदों का वेतनमान क्रमशः ₹44,900–₹1,42,400 और ₹47,600–₹1,51,100 है। ऐसे में स्वीकृत पद पर कार्य करने वाले शिक्षक को इससे काफी कम मानदेय देना उचित नहीं है।
सरकार को नई व्यवस्था बनाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को दोनों शासनादेशों के स्थान पर कानून के अनुरूप नई व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि नियमित शिक्षकों की चयन प्रक्रिया पूरी होने तक आवश्यकता के अनुसार अस्थायी नियुक्ति की जा सकती है। इसके लिए संबंधित प्राधिकारी/आयोग की संस्तुति के आधार पर नियुक्ति की जाएगी और शिक्षक को स्वीकृत पद के न्यूनतम वेतनमान एवं अनुमन्य भत्ते दिए जाएंगे।
इस फैसले से सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में स्वीकृत रिक्त पदों पर मानदेय के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था पर बड़ा असर पड़ने की संभावना है।

